*TODAY'S BHAGWAT GITA SHLOKA*
*DATED 22.03.2026*
*यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।*
*तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥11.29॥*
यथा– जिस प्रकार; प्रदीप्तम्– जलती हुई;ज्वलनम्– अग्नि में; पतङगाः– पतिंगे, कीड़े मकोड़े; विशन्ति– प्रवेश करते हैं; नाशाय– विनाश के लिए; समृद्ध– पूर्ण; वेगाः– वेग; तथा एव– उसी प्रकार से; नाशाय– विनाश के लिए; विशन्ति– प्रवेश कररहे हैं; लोकाः– सारे लोग; एव– आपके; अपि– भी; वक्त्राणि– मुखों में; समृद्ध-वेगाः– पूरे वेग से |
*अनुवाद*
*मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग सेआपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्टहोते देख रहा हूँ, जिस प्रकार पतिंगे अपनेविनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूदपड़ते हैं |*
*Translation*
*I see all people rushing full speed into Your mouths, as moths dash to destruction in a blazing fire.*
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