*TODAY'S BHAGWAT GITA SHLOKA*
*DATED 10.03.2026*
*अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।*
*नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥11.16॥*
अनेक– कई; बाहु– भुजाएँ; उदार– पेट; वक्त्र– मुख; नेत्रम्–आँखें; पश्यामि– देख रहा हूँ; त्वाम्– आपको; सर्वतः– चारों ओर; अनन्त-रूपम्– असंख्य रूप; न अन्तम्– अन्तहीन, कोई अन्त नहीं है; न मध्यम् – मध्य रहित; न पुनः– न फिर; तव– आपका; आदिम्– प्रारम्भ; पश्यामि– देखता हूँ; विश्र्व-ईश्र्वर– हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्र्वरूप– ब्रह्माण्ड के रूप में |
*अनुवाद*
*हे विश्र्वेश्र्वर, हे विश्र्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका अन्त नहीं है | आपमें न अन्त दीखता है, न मध्य और न आदि |*
*तात्पर्य*
कृष्ण भगवान् हैं और असीम हैं, अतः उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता था |
*Translation*
*O Lord of the universe, O universal form, I see in Your body many, many arms, bellies, mouths and eyes, expanded everywhere, without limit. I see in You no end, no middle and no beginning.*
*Purport*
Krishna is the Supreme Personality of Godhead and is unlimited; thus through Him everything could be seen.
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