*TODAY BHAGWAT GITA SHLOKA*
*DATED 22.02.2026*
*यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।*
*तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥10.41॥*
यत्– यत्– जो जो; विभूति– ऐश्र्वर्य ; मत्– युक्त; सत्त्वम्– अस्तित्व; श्री-मत्– सुन्दर; उर्जिवम्– तेजस्वी; एव– निश्चय ही; वा– अथवा; तत्-तत्– वे वे; एव– निश्चय ही; अवगच्छ– जानो; त्वम्– तुम; मम– मेरे; तेजः– तेज का; अंश– भाग, अंश से; सम्भवम्– उत्पन्न |
*अनुवाद*
*तुम जान लो कि सारा ऐश्र्वर्य, सौन्दर्य तथा तेजस्वी सृष्टियाँ मेरे तेज के एक स्फुलिंग मात्र से उद्भूत हैं |*
*तात्पर्य*
किसी भी तेजस्वी या सुन्दर सृष्टि को, चाहे वह अध्यात्म जगत में हो या इस जगत में, कृष्ण की विभूति का अंश रूप ही मानना चाहिए | किसी भी अलौकिक तेजयुक्त वस्तु को कृष्ण की विभूति समझना चाहिए |
*Translation*
*Know that all opulent, beautiful and glorious creations spring from but a spark of My splendor.*
*Purport*
Any glorious or beautiful existence should be understood to be but a fragmental manifestation of Krishna's opulence, whether it be in the spiritual or material world. Anything extraordinarily opulent should be considered to represent Krishna's opulence.